Sunday, 1 July 2012

mera pyar



अपने जीवन के ३२ बसंत देखने के पश्चात आज मैं जब पीछे मुर्के देखता हु तो बहुत सारी यादे ताजे  हो उठती है,
एक अमिर  घर मैं पैदा हुआ, मगर लगभग 12 या  १३ वर्सो  के पश्चात हम जमीन पे आ गए , कोई न वक़्त तो वक़्त है फिर आ जाएगी|
अपने पीछले दस वर्सो मे की कुछ रोचक दास्ताँ सुनाता हू
मेरे जैसे साधारण व्यक्ति के भी सच्चे महिला मित्र या गर्ल फ्रेंड हो सकती है,
मेरे सादगी और बेबाकपन लोगो को पसंद है और साथ ही लोगो जयादा भाव न देना और अपने मे मग्न  रहने की आदत मेरे गर्ल फ्रेंड बहुत पसंद करती है/थी ,
मगर जब वो हमारे करीब आते है तो वो तुरत बदलाव चाहती है ...तुरत.......कोई समय नहीं.....!
पर मैं नहीं बदला या बदल नहीं पाया , जो भी  हो, परिणाम भी वेसा ही आया, रिश्ता जल्द ही बिखराव पे  पंहुचा ,  बहुत आसां है  ये कहना आई लव यू लेकिन निभाना और सचमुच प्यार करना और पयार क़ा इंतजार करना बहुत मुस्किल है,
और विशाल तनहा था तनहा रह गया, पर मैं कभी बदल नहीं पाया ... सच्चाई तो ये है की हमें कभी  प्यार हुआ ही नहीं,
 होता तो शायद मैं भी  देवदास  या उदाश होता/बन जाता , पर ऐसा कुछ घटा नहीं,
मुझे कोई ये समझाए की जो आदते पहले उन्हें पसंद  होती थी उन्ही आदतों पे उन्हें बाद में आपत्ति क्यों?
पहले जब मैं किसी को बहुत जयादा भाव नहीं देता था,अब कैसे मैं किसी को बहुत जयादा भाव दू ,उसके आगे -पीछे नाचू गाऊ,
कैसे अपने बेबाकपन को बंद करू? सादगी छोर के  उनके पसंद के कपडे पहनू? प्यार शायद इन्सान से और इन्सान की सीरत से होता है?
न की इन्सान के कपड़ो या उसके दिखावो से......?
इन्सान की सीरत उसकी अंतरात्मा उसका विचार ही उसकी असली पहचान है, और ये शायद बदलती नहीं,
बदलना भी नहीं चाहिए,
रिस्तो मे मिठास तब घुलती है जब उसमे प्यार और सच्चाई क़ा मिलन हो, जहा  दिखावा और आडंबर नहीं हो,
रिश्ते की डोर मे केवल निष्पक्छ और निश्चल प्रेम हो, सादगी और आत्म-समर्पण हो, बस और  कोई दुनिया की खुशी या चाहत नहीं होती,
जहा बनावटी और बिकाऊ कुछ भी नहीं, समर्पण क़ा भाव , उनकी खुशी ही सब-कुछ, बाकि जाये तेल लेने........... :-)
और विशाल भी कुछ ऐसा ही चाहता है, तो गलत क्या है? कोई तो बताये?
प्यार में जात-पात, धर्म-मजहब कुछ नहीं होता, पोथी पोथी पढ़ जग मुआ , पंडित बना न कोई , ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होई!!!!!!!!!!!
एक बार में जात पात के चक्कर में भी फस गया था, मगर खुद-बा-खुद वहा से निकल गया क्युकी वहा भी मुझे दिल पे लगी नहीं थी ,
और शायद में कुछ अंतरात्मा की आवाज़ को सुनने को बैचन था.
बैचन!!!!!!!!!!!!!!!!
खुदा से माँगा मैंने थोड़ी सी बेचैनी , लोग कहते है बड़े चैन की नीन्द सोते हो मिया...विशाल ,
हा मगर दोस्तों में ये आपको बता दू की में कोई पसोपेश मे नहीं हु, न था, बस थोड़ी सी कमी रह गयी वरना हम भी हो जाते प्यार मे बर्बाद/आबाद !

दोस्तों मैं कीसी के इंतजार मैं नहीं, न कभी था, न कभी होऊंगा,मगर जब भी मेरे ज़िन्दगी में ये सुखद घटना घटेगी मैं तो पूरा एन्जॉय करूँगा!

मेरा हक है! मेरा शौक है! मेरी तम्मना है


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