Friday, 29 June 2012

suraj ki khoj


मैं पिछले सन्डे को इस्कोन से लौट रहा था, बस मैं एक सज्ज़न मिले , उनका नाम मैं नहीं लूँगा ,
वो पि अच् दी इन वेद थे, वो लगे हमारे धरम और आस्था का मजाक उराने,
उनका कहना था मैंने  भगवन की खूब पूजा की, उन्हें बहुत खोजा पर वो मिले नहीं,
फिर वो गीतगोविन्द और ब्रहम-वेवर्त पुराण की बात करने लगे,
हमने उन्हें आदर पूर्वक कहा प्रभुजी हम आपके तरह तो विद्वान नहीं , किन्तु आपको एक कहानी सुनाता हु,
एक अँधा व्यक्ति था, वो दिन र|त सूरज की खोज मे मगन था, किन्तु उसे सूरज मिला ही नहीं,
क्यों ? क्युकी सूरज की खोज ही गलत थी, सूरज तो हर समय हर जगह विध्यमान था ,
कल भी  था, आज भी है, आगे भी रहेंगे ,
'इश्वर की तलाश भ्रम है,जो वास्तव मे  ,हर जगह आसानी से उपलब्ध है, जो आपके अंदर मौजूद है , उसे क्या खोजना,
 
मैं विशाल हु और अगर मैं अपनी खोज करू तो क्या मुझे भटकना चाहिए , नहीं ?,
 
प्रभुजी! क्योंकि ईश्वर खोजने का प्रश्न ही नहीं उठता। वह सदा ही उपस्थित है।


उनको खोज ही करनी थी तो आँखों की खोज करते ,जिन आँखों से सूरज को देख सके ,
आपको भी अपने अन्दर उस प्रेम और विस्वास की खोज करनी थी उस चेतना  की खोज करनी थी , जो आपको भगवन के दर्शन  करा सके.
धरम क्या है मुझे पता नहीं, सायद एक माध्यम  है भगवन को जानने या समझने का, सायद मानवता को अपनाने का,या एक प्राचीन विज्ञानं है अपने अंतरात्मा मैं झाकने का, 

या फिर एक दर्शन है ज्ञान है प्रकास है ............... 
आप पहले अपने अन्दर की आत्मा मे झांके, अपनी अंतरात्मा की आवाज को सुने, फिर खोज करे! ,खोज एक सार्थक खोज , अपनी या मानवता की उन्नति का खोज. ज्ञान का विज्ञानं का खोज 
बस मैं बैठे कुछ व्यक्ति ने मेरी प्रसंसा की किन्तु हमने जिस सज्ज़न से वार्तालाप किया वो अवि व् संतुस्ट नहीं थे उनकी डिग्री एक साधारण लड़के के आगे झुकने को तैयार नहीं, वो अवि और खोज करेंगे, उनके कुसलता के कमाना के साथ...
आपका विशाल श्रेष्ठ